रथ केर पहिया प्राण बैन टुटल अइ नयन प्रतीक्षारत बिछायल जाल खोइल दिय अहा केर भाव मे हम बुन्द बुन्द भिजलौ ओहि भाव बिभोर स मुक्त क दिय हमरा किछ कह लेल अनुमती दिय बस अनुमती दिय किछो देखबाक लेल इजोरिया राइत मे चेहरा चान्द सन हम सजौने रहि मुदा ओहि मे नुकायल अन्हरिया छिपल काजर सन कारी राइत तकरा फेर स अहा लग बखान कर दिय हमरा .... बस अनुमती दिय जिवनक अहि भवर मे रणेवने हम अकेले भटकलौ अहा केर नाम अहा केर शृङ्गार जीवन भैर कोमल हाथ स उठेलौ हम अहि ठोकर मार्ग स अन्जान रहि ओहि बितल मार्ग के उघार कर दिय हमरा... बस अनुमती दिय रचना: प्रतिभा झा
हमरा चाही केवल आधा अधिकार
सुरजक आधा किरण चाही
चांद केर आधा इजोर कs प्रकास
भानस घर मे आधा हिस्सा
आधा भानस हम करब
आधा करथिन स्वामी सरकार
हमरा चाही आधा अधिकार
आधा राजनीति के कुटनीति चाही
मेयर के कुर्सी पर हमहुँ राखब आधा राज
चुनाव केर मैदान मे आधा हिस्सा
आधा भोट हम मांगब
आधा मंग्थिन स्वामी सरकार
हमरा चाही केवल आधा अधिकार
हकदार मे आधा किरदार चाही
मन्नत के रिश्ता मे भगवान के आधा द्वार चाही
संघर्ष आधा तकलिफ आधा
जिन्दगी के हर हिस्सा मे आधा आरजु के चाही हिसाब
आधा किताब केर पन्ना हम बनब
आधा बन्थिन स्वामी सरकार
हमरा चाही केवल आधा अधिकार.....।
प्रतिभा झा
Thank u so much
ReplyDeleteYou are most welcome
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