रथ केर पहिया प्राण बैन टुटल अइ नयन प्रतीक्षारत बिछायल जाल खोइल दिय अहा केर भाव मे हम बुन्द बुन्द भिजलौ ओहि भाव बिभोर स मुक्त क दिय हमरा किछ कह लेल अनुमती दिय बस अनुमती दिय किछो देखबाक लेल इजोरिया राइत मे चेहरा चान्द सन हम सजौने रहि मुदा ओहि मे नुकायल अन्हरिया छिपल काजर सन कारी राइत तकरा फेर स अहा लग बखान कर दिय हमरा .... बस अनुमती दिय जिवनक अहि भवर मे रणेवने हम अकेले भटकलौ अहा केर नाम अहा केर शृङ्गार जीवन भैर कोमल हाथ स उठेलौ हम अहि ठोकर मार्ग स अन्जान रहि ओहि बितल मार्ग के उघार कर दिय हमरा... बस अनुमती दिय रचना: प्रतिभा झा
जितिया पर समय ई केहेन भेल
बन्द अछि जीवनक डोर घर भेल अछि जेल
जितिया पर.............
नहाय खाय मे माछ मगईबतौं, छुरा दही
भैर पेट खैतौं
संग मे मरुवा के रोटि कारी लेल
भोरबा के ओठगन बहुत सुहावन
मुदा बहुत रास पेट कोरोना मे भुक्हल रही गेल
जितिया पर...........
जितवाहन छथि संकट हारी
हिनकर पुजा अछि बड भारी
वर्तमान परिस्तिथिमे संकट विकट अछि
यै संकट सं आब अहिं उबारी
गरिब आउर मजदुर के आँखिक नोर पोईछ देब
जितिया पर..................
नैतिकता के पाठ अहिं सिखेलौं
अपन पहिचान आ अधिकार खोजलौं
भक्त सब श्रद्धा-भाव राखिक पवैन करैए
संघर्ष आ संस्कार के ज्ञान अहिं छी देल
जितिया पर..............
लेखिका,
प्रतिभा झा
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