रथ केर पहिया प्राण बैन टुटल अइ नयन प्रतीक्षारत बिछायल जाल खोइल दिय अहा केर भाव मे हम बुन्द बुन्द भिजलौ ओहि भाव बिभोर स मुक्त क दिय हमरा किछ कह लेल अनुमती दिय बस अनुमती दिय किछो देखबाक लेल इजोरिया राइत मे चेहरा चान्द सन हम सजौने रहि मुदा ओहि मे नुकायल अन्हरिया छिपल काजर सन कारी राइत तकरा फेर स अहा लग बखान कर दिय हमरा .... बस अनुमती दिय जिवनक अहि भवर मे रणेवने हम अकेले भटकलौ अहा केर नाम अहा केर शृङ्गार जीवन भैर कोमल हाथ स उठेलौ हम अहि ठोकर मार्ग स अन्जान रहि ओहि बितल मार्ग के उघार कर दिय हमरा... बस अनुमती दिय रचना: प्रतिभा झा
राम वियोग मे सिता कानी रहल काँट के बाग सं
एक पत्र लिखि रहली सिया राम के नाम सं
राती अछि पुनमके चाँदनी इजोरिया
मुदा प्रियतम हमरा लेल छायल घटा घनघोर अन्हरिया
तड्पई ए माछ बिनु पाइन् जेना
तडैप रहलौं रघुनन्द हमहुँ आहाँ बिना
जाक फसलौं बिछायल मलहा के जाल सं
एक पत्र...................
माटिक वर्तन रही रही हमरा सं फुटी रहल
चुल्हा के आइग नै हमरा सं पजरी रहल
गांथब फुलक हार बिन कोना
निको नै लागे सोल्ह शृंगार पाहुन आहाँ बिना
जाक वोझरेलौं हमहुँ काँट केर गाछ सं
एक पत्र................
हमर मन मन्दिरमे बसल छी बैनक भगवान हे श्री राम
हम चाहीतौ त् हमहुँ महल मे रहीतौ
संयम, समर्पण आ मर्यादा के दिलाव चाहैत छी ब्रह्मांडमे स्थान
अगर चाहीतौ त् हमहुँ धन वैभव आ ऊंचा नाम मंगीतौ
हमर आँखी कानी रहल कल्युगी रावण के नाम सं
एक पत्र......................
Pratibha jha
Thank you so much.
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