रथ केर पहिया प्राण बैन टुटल अइ नयन प्रतीक्षारत बिछायल जाल खोइल दिय अहा केर भाव मे हम बुन्द बुन्द भिजलौ ओहि भाव बिभोर स मुक्त क दिय हमरा किछ कह लेल अनुमती दिय बस अनुमती दिय किछो देखबाक लेल इजोरिया राइत मे चेहरा चान्द सन हम सजौने रहि मुदा ओहि मे नुकायल अन्हरिया छिपल काजर सन कारी राइत तकरा फेर स अहा लग बखान कर दिय हमरा .... बस अनुमती दिय जिवनक अहि भवर मे रणेवने हम अकेले भटकलौ अहा केर नाम अहा केर शृङ्गार जीवन भैर कोमल हाथ स उठेलौ हम अहि ठोकर मार्ग स अन्जान रहि ओहि बितल मार्ग के उघार कर दिय हमरा... बस अनुमती दिय रचना: प्रतिभा झा
ओह!
डेराऊ नै…हम छी….,
खोलु जन्जिर के इ केवार ।
हिम्मत के खन्जर लिय हाथ,
कदम मिठास के बढाउ हमरा पास ।।
यै…..
किताब के पन्ना आबो त पल्टाउ,
समुन्दर के गेहराइ मे जुनि उलझाइउ ।
आहाँ आँगन के चिरै रानी छी,
पिन्जरा अखन खुजल अइ ….
आबो तs करुणा शोभा बैन बाहर आउ ।।
आहा!
फुलक डाली सन खिलल क्यारी,
संसार के बगान मे उडान भरु ।
रचनात्मक यै मन्जिल मे,
आँहा सिंगार के मुस्कुराइत भोर बनु ।।
लेखिका,
प्रतिभा झा
Super and thank u
ReplyDeleteThank u so much
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